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Sunday, 12 February 2017

Jolly LLB 2 (2017) Review


Jolly LLB 2 (2017)
Rating- 7/10
Comedy
Directed by-Subhash Kapoor
Produced by-Fox Star Studios
Written by Subhash Kapoor
Screenplay by Subhash Kapoor
Starring Akshay Kumar,Annu Kapoor,Huma Qureshi,Saurabh Shukla
Cinematography Kamal Jeet Negi
Edited by     Chandrashekhar Prajapati
Production company Fox Star Studios
Release date- 10 February 2017 (India)
Running time 137 minutes
Country     India
Language Hindi

Spoilers*- वैसे तो फिल्म की कहानी ऐसी है नहीं, जो किसी को पता ना हो, लेकिन फिर भी चेतावनी!

Plot-  कहानी लखनऊ में शुरू होती है! जहाँ के न्यायालय में एक बड़े सफल बुजुर्ग वकील रिजवी साहब हैं! जिनकी सहयोगियों की फ़ौज में एक अदने से असिस्टेंट बने हैं पंडित जगदीश्वर मिश्रा उर्फ़ जॉली (अक्षय कुमार)! इनकी पत्नी के रोल में है पुष्पा पाण्डेय (हुमा कुरैशी), पत्नी-पति का रिश्ता अल्ल्हड़पने से भरा हुआ है, पति रिजवी साहब की नॉन वेज पार्टी से आधी रात में आ रहा है, एक दारु की बोतल खोलकर बैठ जाता है, जनेऊ को कान में लपेटकर दारु की बूंदे अपने ऊपर छिडक लेता है और उसकी सोती हुई पत्नी दारु की खुशबु से जागकर उसका पेग खुद गटक जाती है!  कहानी में ऐसा लगता है जैसे प्रेमिका को जबरदस्ती पत्नी का रोल दे दिया गया! पंडित जी रोटी पका रहे हैं, और उसको खिला रहे हैं! मतलब कुछ नए तरह का पति-पत्नी का रिश्ता है!
पंडित जी के सपने बड़े हैं, लेकिन जेब में तंगी रहती है, वो चाहते हैं कि वो भी बड़े वकील बनें, लेकिन इसके लिए सही मौके की तलाश में हैं! खुद का अपना चैम्बर हो, इसलिए वो एक मुस्लिम लड़की का केस रिजवी साहब लड़ेंगे ऐसा धोखा देकर अपने लिए पैसे ऐंठ लेते हैं! मामला कुछ ऐसा गड़बड़ा जाता है कि लड़की सुसाइड कर लेती है और असिस्टेंट साहब की मरी हुई आत्मा जागकर कहती है, कि मिल गया मौक़ा, जा बन जा बड़ा वकील!
लड़की का केस अपने शौहर को न्याय दिलाने का था, जिसको लखनऊ के बड़े पुलिसिये सूर्यवीर सिंह ने फेक एनकाउंटर में मार डाला था!
जॉली अब इस केस को लड़ने की ठान लेता है, सामने हैं सूर्यवीर के वकील माथुर साहब (अन्नू कपूर) और जज का रोल कर रहे हैं वही पुराने दिल्ली से लखनऊ पहुंचे जॉली वाले जस्टिस सुन्दरलाल त्रिपाठी (सौरभ शुक्ला)

फिल्म शुरू होते ही यह बताया जाता है कि पूरी फिल्म काल्पनिक है, इसलिए इसको बनाने और दिखाने का उद्देश्य साफ़ तौर पर लोगों के बीच भारतीय न्याय व्यवस्था की मजबूत छवि बनाना है! अंत में सौरभ शुक्ला का एक छोटा सा भाषण सुनकर फिल्म क्यूँ बनाई गई, वो खुद पता चल जाता है!
यह फिल्म खालिस सेक्युलर प्रजाति के भारतीय लोगों के लिए बनाई गई है! जो हिन्दू-मुस्लिम वगैरह किसी भी धर्म वाले खुद को सेक्युलर नहीं मानते हैं, अंत में उनके लिए यह फिल्म देखने लायक नहीं रहेगी क्यूंकि लखनऊ की गंगा-जमुनी वाली सभ्यता इस फिल्म में कूट कूट कर उड़ेली गई है, जिससे कट्टरता की गर्मी ठंडी होने का डर बन गया है!
लखनऊ एक ऐसा शहर है जहाँ हिन्दू ब्राह्मण और मुस्लिम दो सबसे बड़ी आबादी हैं! इसलिए इस फिल्म में हर किरदार धर्म के चश्मे से देखना मजबूरी बन जायेगी! इसमें होली का एक गीत है, जिसका पूरी शूटिंग का बैकग्राउंड अगर आप गौर से देखेंगे तो इस्लामिक कलाकृतियों से सजी लखनवी इमारतों को दिखाता है! फिल्म में जॉली को गोली लगती है, तो उसकी पत्नी मंदिरों के अलावा दरगाहों वगैरह पर भी मन्नत मांगने जाती नज़र आ रही हैं!
फिल्म में कश्मीर से एक मुस्लिम पुलिस वाले का किरदार है, जो ईमान का पक्का है, तो एक पंडित बने हुए मुस्लिम का रोल है, जो इस्लाम के नाम पर धब्बा है! उसके साथ जॉली का एक रैपिड फायर धार्मिक क्वेश्चन राउंड बहुत जोरदार बनाया गया है!
फिल्म में कानून चलाने वालों का भ्रष्टाचार किस हद तक न्याय पालिका और पुलिस की वज़ह से देश और समाज को खोखला कर रहा है! इसको भी उभारने की हल्की कोशिश हुई है!
रोल-
काफी दिनों बाद कोई फिल्म आई है जो अकेले अक्षय कुमार के ऊपर नहीं टिकी हुई है! यहाँ उनके साथ अन्नू कपूर और सौरभ शुक्ला दोनों ही मजबूती से नज़र आते हैं! अक्की के हिस्से में अगर शुरूआती कुछ सीन और गाने हटा दिए जाएँ तो बाकी दोनों को भी बराबर का रोल मिला है! इसलिए हम कहेंगे कि इस फिल्म में 3 हीरो हैं! हुमा का रोल छोटा है! जैसे पिछली फिल्म में अमृता राव का था!
सहयोगी भूमिकाओं में जो लोग मौजूद हैं, वो अपना अपना काम अच्छे से कर लेते हैं! जो दर्शकों को याद रहेगा!
कॉमेडी- स्तरीय और संवादों की वज़ह से उभारी गई कॉमेडी इस फिल्म में जान डाल देती है! कोर्ट रूम में जो कुछ होता है, वो लगभग कॉमेडी स्टाइल में ही दिखाया गया है! फेक एनकाउंटर केस कितना गंभीर मामला है, पर बहुत हल्की-फुलकी तरह से इसमें न्याय किया गया है! सनी देओल जैसे वकील अपनी फिल्मो में और अक्की जैसे वकील इसमें दोनों एक ही काम कर रहे हैं, सिर्फ प्रेजेंटेशन अलग है! कोर्ट के अन्दर अक्की का अन्नू कपूर को मारा गया तमाचा फ़िल्मी कहानियों में यादगार के तौर पर रखा जा सकता है! :v
फिल्म कैसी है- फिल्म 2 घंटे 16 मिनट की है! शुरू के आधे घंटे में लखनऊ की सैर,यहाँ के ज़मीनी माहौल को फील करवाया जाता है! उसके बाद फिल्म मुख्य कहानी पर आती है! और अंत तक दर्शकों का मनोरंजन कर डालती है! अक्की का रोल आपने खट्टा मीठा में देखा हुआ है, कुछ कुछ उसी तरह से निभाया है, सिवाय कोर्ट रूम ड्रामा के!
कोर्ट रूम के अन्दर जब फिल्म के तीनो हीरो आपस में जुगलबंदी दिखाते हैं, वही फिल्म का आकर्षण है! बाकी केस-न्याय तो दोयम हिस्सा है!
काल्पनिक कहानियों को ज्यादा गंभीर होकर ना देखें, असली ज़िन्दगी में ऐसा बहुत कम होता है, यह फिल्म भी अपवाद है!

Monday, 17 November 2014

Review : The Shaukeens (2014)

Review- The Shaukeens (2014)
Genre- Comedy Drama
Cast- Akshay Kumar,Lisa Hayden,Anupam Kher,Anu Kapoor,Piyush Mishra
Ratings : ★★★★☆☆☆☆☆☆

दिल्ली के 3 बुड्ढे अपने ठरकी शौक पूरे करने के लिए मॉरिशस आते हैं! यहाँ इन्हें मिलती है..एक लड़की जो सुंदर कम पगली ज्यादा है! यह लड़की अक्षय कुमार की फैन है और इसको पटाने के लिए तीन बुढ्ढे अक्षय से इसको 3 बार मिलवाते हैं! थोड़ी नाटक नौटंकी के बाद फिर अक्षय अपने रास्ते और यह अपने.....अंत में कहानी हैप्पी एंडिंग!

दी शौकीन्स को देखते हुए हमें एक बात कहनी पड़ रही है कि इसको देखने से अच्छा था कि ओरिजिनल मूवी दोबारा देख लेते!
अक्षय की मूवी तो यह है नहीं..इसलिए उसकी तरफ से कोई कमी नहीं दिखती..बल्कि जितनी देर वो रहा..मूवी में intrest बना रहा!
इस फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी इसके डायलाग राइटर "तिग्मांशु धूलिया" निकले! 
तिग्मांशु को जहाँ तक सभी जानते हैं शायद कॉमेडी फिल्म ना खुद बनाते हैं..और ना उसमे काम करने का कोई ख़ास तजुर्बा है इन्हें! फिर भी ना जाने किसने इन्हें फिल्म के संवाद लिखने का काम सौंप दिया! बहुत निराश किया इन्होने! ऐसा एक भी चुटीला संवाद नहीं सुनाई दिए..जिसको याद रखा जा सके!
हमारे तीन बुढ्डे अपनी तरफ से कोशिश करते दिखे जरूर पर निकल के वो बात आई नहीं..जिसकी उम्मीदें थी!
अनुपम खेर सपाट अभिनय कर रहे थे! जोश और फिल्म करने की कोई ख़ुशी नज़र नहीं आई!
ऐसा लगा जैसे यह फिल्म वो टाइमपास के लिए कर बैठे!
पियूष मिश्रा थोड़ी सम्भावना लायक लगे..पर इन्हें क्यूंकि तीसरे दर्जे पर रखा गया था..तो यह सिर्फ सहायक बनकर रह गए! फिल्म के आखिर में इन्हें जो 10 मिनट मिले! वही कुछ ठीक थे!
अनु कपूर के ऊपर यह फिल्म बाकी समय काफी हद तक टिकाई गयी है! और हमारे हिसाब से इन्हें जो रोल दिया गया..वो इन्होने जितना हो सकता था..अच्छे से करने की कोशिश करी! लेकिन इनके आड़े आ गयी..इनकी कम फिल्में करने की आदत..जिसने इनको उभरने से रोक रखा है!
इस फिल्म को सही लोगों के साथ बनाया नहीं गया है! शायद बोमन ईरानी अगर इसमें होते तो कुछ फर्क आ सकता था! या सबसे अच्छा होता कि इसमें थोड़े बड़े नाम लिए जाते...जैसे नसीरुद्द्दीन शाह या पंकज कपूर..जो अपनी दमदार एक्टिंग से स्क्रिप्ट की कमियों को काफी हद तक ढँक देते हैं!

आजकल जिस तरह से लाउड कॉमेडी लोग पसंद करते हैं..यह फिल्म बहुत ज्यादा dull लगती है!..कोई ख़ास चमक दमक नहीं...ना कोई ख़ास सिचुएशन बनाई गयी! जिससे कहानी को मदद मिले!
लिसा हैडेन को देखना सिरदर्द से कम नहीं था..इतनी ओवर एक्टिंग और घटिया डायलाग डिलीवरी काफी समय बाद देखने को मिली है!

फिल्म दर्शको को पसंद आ रही है...ऐसा सुना..अब इसमें क्या कहा जा सकता है! लोगों की पसंद और नापसंद कब क्या गुल खिला देती है!
डायरेक्टर अभिषेक शर्मा "तेरे बिन लादेन" का आधा काम भी इसमें नहीं दिखा पाए! स्क्रिप्ट का महत्व क्या होता है...ऐसी फिल्मो से पता चलता है! भगवान् जाने अगर अक्षय कुमार का नाम फिल्म से ना जुड़ा रहता तो इसका क्या हाल होता!
अपने करियर में पहली बार अक्षय कुमार अपने ऊपर ही दर्शको को हंसाते हुए देखे गए! ओह माय गॉड! के बाद से वो अब ऐसी कई फिल्में करते जा रहे हैं..जिनमे उनका रोल बहुत कम होता है! यह एक खतरनाक बात है..कहीं उनके fans उन फिल्मो को भी देखना कम ना कर दें..जिनमे उनका पूरा रोल होता है! यह फिल्म अक्षय को नहीं करनी चाहिए थी! "इश्क कुत्ता है और अल्कोहोलिक 2 गाने फिल्म में रखे गए हैं..जो नयी पीढ़ी के लिए हैं.. सुनने में कर्कश!
कोई अक्षय कुमार वाला वही स्पेशल नारियल पानी हमें दे दो! हम तो शायद ही इसको कभी दोबारा देखें! :v