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Tuesday, 2 June 2015

ANOKHA CHOR (2015)



Review-अनोखा चोर  (2015)

Genre-Senseless Comedy

Main character(s)- बांकेलाल,विक्रम सिंह,घासुमल घसियार!

समीक्षा में समझ नहीं आ रहा क्या बताएं...कहानी को लिखें या अपना अनुभव! इस कहानी को शुरू करते ही 5 पन्नो पर ही सिर में दर्द शुरू हो जाता है! कहानी हद से ज्यादा फ़ालतू और predictable बनाई गई है! इसमें एक चोर है जिसको चोट्टादेव से वरदान मिला है कि वो 24 घंटे के लिए कोई भी चीज़ चुरा सकता है..और उसके बाद वो चीज़ वापस अपनी सही जगह पहुँच जायेगी! बांकेलाल यह सुन लेता है और चोर के साथ मिलकर विक्रम के खिलाफ एक महाघिसेला उबाऊ षड़यंत्र 1018वी बार बनाता है! वही होता है इधर षड़यंत्र उधर उसका तोड़! अरे यह तो किसी पागल ऋषि के दिए शाप का काट था...बहुहुहुह मेरी मौत तो ऐसे ही होनी थी..नींद में बांके को शिक्षा शास्त्री दिखता है भाई....हद्द दर्जे की बकवास इस कॉमिक्स में कूट-कूट कर परोसी गई है! डायलॉग्स इतने बेकार और बचकाने हैं कि पढना मुश्किल हो जाता है! फ़िल्मी गानों की पैरोडी मारना, और कई पुरानी कॉमिक्स से उठाये गए हिस्से को दोबारा दिखा देना अब बांकेलाल का ज्यादा समय तक भला नहीं किया जा सकता है! अच्छा होगा...विशाल राव मैसूर जी को कहा जाये कि वो कॉमिक्स ग्रुप्स में आयें...लोगों से जानें कि उन्हें क्या पढना है..कहाँ कमियां हैं...वरना बांकेलाल को इस तरह से बर्बाद करने से अच्छा है..उसको सही कहानियां आने तक विराम दिया जाए! इस कॉमिक्स को छापकर RC ने कागज़ की जो बर्बादी करी है..दुखद है! आप लोग अपने पैसे इसपर बर्बाद ना करें! और RC भी इसको दोबारा रीप्रिंट ना करे!

चित्रांकन में कुछ नया बताने को यहाँ नहीं है...जैसा पिछले कॉमिक्स में बनता आया है..वैसा ही है!

कुल मिलाकर अनोखा चोर को पब्लिश करना RC की एक बहुत भयंकर भूल है...उसकी भूल की सजा पाठक अपनी जेब और दिमाग को ना ही दें तो बेहतर होगा..बाकी जनता की इच्छा!

Ratings :

Story...★☆☆☆☆☆☆☆☆☆

Art......★★★★☆☆☆☆☆☆

Entertainment……★☆☆☆☆☆☆☆☆☆

#Rajcomics,#Bankelal,#Sushantpanda,#Anokhachor




Friday, 17 April 2015

PO PO POLA (2015)




Review-पो पो पोला (2015)
Genre-Adventure
,Comedy
Main character(s)- बांकेलाल,विक्रम सिंह,मरखप,स्वर्णलता,मोहक,घड़ियाल!

‪#‎Creative_team‬
Writer- Penciller - सुशांत पंडा
Inker-फ्रेंको
Colorist- बसंत पंडा
Calligrapher-नीरू

पो पो पोला...नाम सुनकर आपके दिमाग में जरूर कोई खम्बा कौंध गया होगा...जी हाँ आप सही हैं...यहाँ बात खम्बो की ही हो रही है...जिसपर टिकाई गई है..एक कमसिन काया...वो काया किसकी है..यह तो आप कॉमिक्स में जानियेगा! कॉमिक्स कैसी रही..यहाँ जानिये!

कहानी में इस बार जो कुछ होता है वो वास्तविकता में ना होकर सपनो के अन्दर हुआ है! यहाँ चीज़ वही दशको पुरानी है कि बांकेलाल फिर एक बार कोशिश करता है कि राजा को मारा जा सके...लेकिन वो खुद नहीं जानता है कि इस बार कहानी की डोर उसके हाथ में नहीं है! शुरुआत राजदरबार में चल रही रोजाना की कार्यवाही से होती है...जिसमे हमेशा की तरह एक ऋषि पंगा कर देता है..जिसको सुलझाने की ज़िम्मेदारी बांके के ऊपर आ जाती है! इसमें बांके हमेशा जो कुचक्र अपने फायदे के लिए करता आया है..वही यहाँ भी जारी है! इसलिए आगे की कहानी आप लोगों के लिए भी predictable है! जिसके दौरान एक तरफ यह कॉमिक्स कई जगह हंसाती है..तो कई जगह कमजोर भी लगती है!
कुछ ख़ास पन्ने जरूर अच्छे बने हैं...जैसे सालों के बाद एक बार फिर से बांके ने रानी स्वर्णलता पर डोरे डाले हैं! यह चीज़ बीच के कई साल तक गुम नज़र आ रही थी...मगर इसमें होते देखकर वापस मज़ा आता है..जब मोहक सिंह अपनी माँ को बचाने के जतन करता है!
पेज-15 पर मरखप की क्षमा के हाथो हुई धुलाई भी गुदगुदाती है...घड़ियाल द्वारा छिछोरी हरकतों में भी हंसी आती है....फिर जब मरखप और घड़ियाल मिलकर छिछोरे संवाद साथ में बोलते हैं..तो भी ठहाके लगाए जा सकते हैं! क्षमा की जलन, विक्रम सिंह का नशे में किया गया ज़ोरदार नृत्य और मरखप की बीवी की 99 टांगो वाला प्रसंग इस कॉमिक्स के कुछ आकर्षक पहलु हैं!
लेकिन एक बात जो महसूस हुई वो यह कि इन गुदगुदाने वाले पन्नो के बीच में जो कहानी बुनी गई थी...उसमे पुरानापन ही बना रहा..ना तो उसको पढने में दिलचस्पी जागती है..ना उससे कुछ नया निकलता है! अगर यह कहा जाए कि इस कहानी में हास्य अलग और कहानी अलग लगती है..तो गलत ना होगा!

यहाँ हमने कई जगह छिछोरा शब्द इस्तेमाल किया है...इससे तात्पर्य है कि कोई पुरुष किरदार महिला किरदार के साथ छेड़छाड़ करता हुआ दिखाया जाता है! यह चीज़ कुछ समय पहले तक तो ठीक थी..लेकिन जब इसको कुछ अच्छी प्रतिक्रियाएं मिल गई तो हमेशा की तरह राज कॉमिक्स ने इसका भी Overuse कर लिया है! क्यूंकि अब हर कॉमिक्स में मरखप के माध्यम से यह दोहराया जा रहा है! ऐसी चीज़ें तभी अच्छी लगती हैं जब कभी कभार हो...या फिर कहानी में “स्तरीय हास्य” के बीच में हल्की फुल्की तरह से दिखाई जाएँ...लेकिन अगर कॉमिक्स में सिर्फ हास्य के नाम पर बकलोली होती रहे...तो यह किरदारों के साथ न्यायसंगत नहीं है! मरखप और क्षमा को लगातार एक ही तरह से दिखाया जा रहा है...इससे दोनों टाइप्ड हो गए हैं! इन दोनों के किरदारों में अब कुछ नया सोचा नहीं जा रहा जो गलत है! लेखक यदि पुरानी कहानियां के दोहराव से बचें...नवीन प्रसंग सोचें..नए किरदार जोड़ते हुए...कहानी का क्षेत्र ज्यादा से ज्यादा विस्तृत बनाएं तो बेहतर बात होगी! बांकेलाल में जो लगातार दोहराव होता जा रहा है..वही एक लाइन की कहानी..और वही दिखे सुने पात्र...आप कब तक बांके को सिर्फ राजा बनने की कोशिशो,मरखप को छिछोरी हरकतों और मोहक सिंह की बांके से जलन और विक्रम के भरोसे पर कहानी लिखते रहेंगे! storyline में बदलाव लाना अब जरूरी हो गया है..वरना बांकेलाल सीरीज में धीरे धीरे पाठको की रूचि कम होती जायेगी!
बेशक लेखक को हास्य के लिए कुछ तारीफ मिल जाए..पर कहानी में कोई ख़ास बात नहीं है! यह एक साधारण सी कॉमिक्स है!

चित्रांकन हमेशा की तरह ही है.. सुशांत जी का ट्रेडमार्क आर्ट जैसा उनकी पहचान बन चुका है! उसपर कुछ ख़ास कहने को नहीं है! कहानी को ठीक से प्रस्तुत करने लायक काम हुआ है! ना ज्यादा उत्साहित करता है और ना ज्यादा निरूत्साहित!

कुल मिलाकर पो-पो-पोला One Time Read जैसी है! बांके सीरीज में याद रखने लायक वैसे भी ज्यादा कुछ नहीं होता है! यह भी पढ़ें और भूल जाएँ!

Ratings :
Story...★★★★☆☆☆☆☆☆
Art......★★★★★★☆☆☆☆
Entertainment……★★★★★☆☆☆☆☆

Wednesday, 12 November 2014

MAHAMELA




Review : महामेला (2014)
Genre : Not Found
लेखक : तरुण कुमार वाही,विशाल राव मैसूर
आर्टवर्क : सुशांत पंडा
इंकिंग: दीपक कुमार
रंग: बसंत पंडा
शब्दांकन: मंदार गंगेले
मुख्य पात्र : बांकेलाल,विक्रम सिंह और विभिन्न नए  किरदार

बांकेलाल के प्यारे पाठको..समीक्षा पढने से पहले सभी एक बार कहिये.... हीहीही
महामेला की कहानी का सार कुछ यह है कि एक डाकू "झमेलासिंह" को मेलों से नफरत है...उसकी लूटपाट से विशालगढ़ त्रस्त है..बांकेलाल हमेशा की तरह उसको पकड़ने रवाना किया जाता है! उसको पकड़ने में नाकाम होने के बाद बांके को मिलता है उस डाकू का एक हमशक्ल! हीहीही... अब आगे कहानी बताने की जरूरत नहीं पड़ेगी!

‪#‎हास्य_पक्ष: यह एक बिना स्क्रिप्ट की  बोरियत से भरपूर ऐसी कहानी है...जिसमे हास्य नाम की कोई चिड़िया दूरबीन लेकर खोजने से भी नहीं मिलेगी! बांकेलाल में अब शायद राज कॉमिक्स के पास कुछ नया करने को बचा नहीं है इसलिए वही ऋषि,डाकू,हमशक्ल,देवता डालकर सिर्फ सेट में बांकेलाल को पेश करने का काम किया जा रहा है! वैसे जिनको यह मुफ्त में मिल गयी थी...वो खुद को सौभाग्यशाली समझें..और जिनको पैसे देकर लेनी पड़ी..वो हीहीही का उल्टा करें!(नहीं समझे... बुहूहुहू)
राज कॉमिक्स से हम अब यह कहना छोड़ रहे हैं कि क्या और कैसी कहानियां लिखिए!(क्यूंकि यह करते करते सालों बीत गए पर हाथ में ऐसा मेला रुपी पका हुआ केला ही आता है...महीनो के इंतज़ार के बाद सेट में एक तो सिर्फ 2 कॉमिक्स और उसमे में एक ऐसी)

‪#‎आर्टवर्क‬ -
सुशांत जी का आर्ट है...और लगभग औसत दर्जे का है! वैसे भी सर्वनायक पर उनके जाने के बाद बांकेलाल से ज्यादा की उम्मीद नहीं है! इस बार तो कहानी में क्षमा भी नहीं थी...जिसको देखकर क्षमा दी जा सके!
बाकी सभी विभाग काम चलाऊ हैं! मतलब काम पूरा हुआ है!आपके पैसे का पूरा उपयोग है..कॉमिक्स रंगीन है(ब्लैक & वाइट नहीं है)..bubbles में डायलॉग्स भी हैं(हाँ भाई.पढने के लिए ही लिखे गए हैं)
पाठको.. हमने तो इस मेले की सैर कर ली..और हमें ज्यादा मिर्च मसाला पसंद नहीं था(जिसकी वज़ह इसके पहले पन्ने पर है) हमने सिर्फ फलों का आनंद लिया(मतलब आर्ट के चुनिंदा पन्नो का)...आप जरूर इस मेले में सावधानी से कदम रखते हुए ही आगे बढिए.....फिसलने का डर है!

Ratings :
Story.....★★☆☆☆☆☆☆☆☆
Art........★★★★★☆☆☆☆☆

#Rajcomics,#Bankelal

Monday, 5 May 2014

Jai Ashleela Gang (जय अश्लीला गैंग) _NSFW 18+






Review- Jai Ashleela Gang (जय अश्लीला गैंग) _NSFW 18+
421 Brand Beedi Federation
(Mohit Sharma,Soumendra Majumder,Manabendra Majumder)
Genre- Satire/Comedy “Indi Work” (Moderate Graphic sexuality and language)
Pages- 13 (Including cover)
Available Format : ecomics
Download Links :

http://www.readwhere.com/publication/6759/Jai-Ashleela-Gang-Comic-

http://www.slideshare.net/Trendster1/jai-ashleela-gang

https://docs.google.com/file/d/0B6E4s4X4Xm5bLWwyTEpWdC1WQW8/edit?usp=sharing

http://www.touchtalent.com/comics/art/Jai-Ashleela-Gang-Comic--206505

Indian Comic Industry se aap sabhi Waaqif hain....Ek Normal Comics se bhi honge...Usse alag jab baat aati hai...toh kuch limited pages ki comic strips bhi aapne padhi aur pasand kari hain.
Freelance Writer Mohit Sharma Isse alag bhi kai tarah ke works likhte rahe hain...jinhe Raj aur Fenil Comics ne prakashit kiya hai...jinme India ki first Poetic Comics shaamil hain.
"Jai Ashleela Gang" Naam ki yeh Comic Strip Normal works se alag ek khaas Readership ko dhyaan rakhte huye likhi gayi hai...Ek aisa varg jo Versatile works dekhna chahta hai..aur Physicaly/mentally already prepare hai.
Humein yeh Book satirize lagi....New Youth ke upar Focus karti huyi...jiske liye Aaj ki Date mein Obscenity ke maayne apni suvidha anusaar alag tarah se likhe jaa rahe hain....Isko aap aajkal ki Movies/Music Albums mein dekhte hain...Jahan kaise ek Below average singer bhi Basic Singing ki jagah doosre factors par focus karke.... raato-raat Sabki aankhon ka taara ban jaata hai.

Isme Ek Rapper ke baare mein bataya gaya hai...jo ek limited daayre mein bahut famous hai...Uski yeh Kuen ke mendhak waali Luxury life kaise ek jhatke mein badal jaati hai..jo usne bhi naa socha thi.
Kaise?
Yeh aap iss book ko padhkar jaan sakte hain.

Writing style : Iss story ko Rhythmic slang format mein likha gaya hai...Yeh Normal poetry jaisa hi hai...lekin ek poori story ko batata hai.
Word/Page Limits mein Yeh style Use karna Sabke bas ki baat nahin hai...Situation ke according sahi words/phrases ka istemaal kiya jaana aur usme padhne waale ki ruchi rakhne ke saath-saath mahaul ko sahi se describe kiya gaya hai!
Theme Comedy hai...Agar aap Pehle page ko dekhte hi Muskura uthe toh matlab saaf hai...Aapki ruchi Iss Genre mein hai ;)

Artistic Style : Majumder Brothers Ke kuch works aapne Fenil Comics mein dekhe hain...Agar nahin dekhe toh Unke FB page par jaroor dekhiye.
https://www.facebook.com/fenilcomics‎
Iss Comic ko draw karna aasaan nahin tha..basharte Aap koi Hard Rule follow nahin karte ho.
Strong toh nahin lekin moderate Graphic sexuality rakhna Iss Book ka ek Key factor hai.
Har page ko fully describe karna akele writer nahin kar sakte the..yahan par Artists ne Ek Step aage jaakar work kiya hai.
Pages mein aapko kuch jagah Backgrounds par bhi scenes dikhenge jinke baare mein text nahin hai..par woh bhi story ka ek jaroori hissa hain.


“Aadhi Aabaadi” ko bhi yeh Book kuch conditions par jyada pasand aa sakti hai..Isliye ghabraane ki jaroorat nahin lagti.
Overall Yeh ek behtareen Comic Book hai...Jo 10 Minute mein aapko Fresh mind kar degi.
My Ratings : 9/10

Wednesday, 26 March 2014

DARSHAN DO YAMRAJ

कॉमिक समीक्षा - दर्शन दो यमराज

Genre-Comedy-Dr
ama

Plot-शुरुआत होती है बांकेलाल के षड़यंत्र में इस बार यमराज को भी शामिल करने से...जिससे विक्रम सिंह के ऊपर आ जाते हैं...संकट के बादल...शुरू के 42 पन्ने इस संकट के निवारण की जद्दोजहद में गुजर जाते हैं...इस भाग में 3 बार विक्रम मौत से बचते हैं! बांकेलाल मरखप के हाथो अपनी पोल खुलवाते हुए बड़ी मुश्किल से बचता है!
इसके बाद विक्रम सिंह को जाना पड़ता है...वन में अपने ऊपर आये संकट को दूर करने का लम्बा उपाय करने...और राजा बनता है सेनापति मरखप! आगे के 42 पन्ने बांकेलाल के मरखप का जीना हराम करने को समर्पित हैं! जान बची तो लाखो पाए...लौट के बुध्धू घर को आये..की तर्ज़ पर...मरखप को अक्ल आ जाती हैं...और उसके बाद नए राजा के तौर पर दूसरे मंत्री अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं..कौन कौन मंत्री हैं..और उनके साथ बांके क्या क्या गुल खिलाता है....यह तो आप कॉमिक्स पढ़कर जानियेगा!
अंतिम भाग को पढने से पहले आप "कर बुरा हो भला" और "लाश की तलाश" नमक बांके की शुरूआती कॉमिक्स जरूर पढ़ें...क्यूंकि एक भूला भटका खलनायक वापसी करता है...जिसका गेटअप आजके मशहूर विलेन रोबो जैसा है...हीहीही

Story View-विवेक मोहन जी की परिकल्पना यानी कुछ अच्छा मिलेगा..यह तय था...तरुण कुमार वाही-अनुराग कुमार सिंह ने 128 शानदार पन्नो की रचना करी है! हास्य सहयोग में सुशांत जी का भी योगदान सराहनीय है!
इसको एक ड्रामा-जर्नी कहा जा सकता है...तीन कहानियां जो एक दूसरे से अलग हैं...लेकिन एक के बाद एक आती हैं...राज कॉमिक्स ने यह बेहतरीन निर्णय लिया कि इनको एक साथ पब्लिश करवाया...एक मोटी किताब के रूप में! तीनो कहानियां अच्छी लिखी गई हैं...हास्य भी काफी डाला गया है...और विक्रम सिंह के ना होने से कहानी भी दूसरे किरदारों की तरफ चली जाती है...जिससे नयापन मिलता है! मरखप सिंह का किरदार बहुत मजेदार लगता है! और बांकेलाल के बारे में कुछ कहना बेकार है...वो तो एक आंधी की तरह है...जो सामने मिला..उसको ही उड़ा देगा! बाकी लगभग सभी दरबारियों को कहानी में हिस्सेदारी मिली है! राजमार भी एक अहम् विलेन साबित हो सकता है!

आर्टवर्क- बेहतरीन! सुशांत जी द्वारा चित्रित और बसंत जी द्वारा रंग संयोजन हुआ है!
इंकिंग फ्रेंको,आनंद तिर्की
शब्दांकन-नीरू और सुखबीर

हमारा मत है...कि सभी बांके प्रेमियों को यह सुपर विशेषांक जरूर खरीदना चाहिए!

BELMUNDA KA KHAJANA


कॉमिक समीक्षा - बेलमुंडा का खजाना

Genre- Comedy-Action-F
antasy

Plot- पिछले भाग समुद्री लुटेरे में आपने पढ़ा था..कि हम्मा-हम्मा आयाम में पहुंचे नागराज,ध्रुव और फाइटर टोड्स 7 में से 2 पड़ाव पार कर चुके हैं! इस भाग में वे बचे हुए 5 पड़ाव पार करके एक बार फिर दुनिया पर आया संकट दूर करेंगे!

Story view- 74 पन्नों की यह कॉमिक्स पूरी तरह से एक्शन पैक्ड है...लेखक ने कहानी की गति को तेज़ रफ़्तार से बढाया है...जिसमे 5 पड़ाव पार करने के लिए सभी अपनी पूरी जोर आजमाइश करते नज़र आते हैं!
किरदारों की बात करी जाए...तो कहानी में सबको अपने हिस्से में पर्याप्त जगह मिली है...फाइटर टोड्स पूरी कॉमिक्स में छाए नज़र आते हैं...वहीँ ध्रुव से भी हर सही जगह पर अपनी चतुरता का प्रदर्शन लेखक करवाते दिखे हैं! नागराज ने अपने हिस्से के काम सबके सहयोग से पूरे करे हैं!
लेकिन कहानी में जहाँ भी "बलमा पोपट" को संवाद मिलते हैं...वो कहानी का मुख्य आकर्षण बन जाता है! एक हास्य कहानी में ऐसे किरदार होना बहुत जरूरी हैं...जिनके लिए पढने वाले को उत्सुकता बनी रहे! बलमा पोपट इस सीरीज की खोज कहा जा सकता है!
2 आयामों में चलती इस कहानी में कई प्रश्न खड़े मिलते हैं...लेखक ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश करी है...सबके उत्तर यथासंभव देने की...लेकिन कहानी को अंत में 1-2 अतिरिक्त पन्ने मिलने चाहिए थे! क्यूंकि 2 महत्वपूर्ण कथा प्रसंग
* बेलमुंडा का अविजित हम्मा-हम्मा का त्रिशूल चुराना !
* कैटरपिलर का पहली बार में देवों द्वारा हार होने पर पृथ्वी के आयाम में प्रवेश व् अपनी जान बलमा पोपट के अन्दर स्थानांतरित करने वाला प्रसंग दिखाया जाना चाहिए था...क्यूंकि बेलमुंडा और उसकी सेना की जान निर्जीव खजाने में हो सकती है...जो सदा रक्षित बना रहा...लेकिन "बलमा पोपट" एक जीवित प्राणी है....कैटरपिलर को यह आशंका बनी रहनी चाहिए थी..कि बलमा को बेलमुंडा या हम्मा-हम्मा की काली शक्तियों से सदियों तक खतरा था!

नितिन जी के एक्शन और कॉमेडी पर काफी बढ़िया पकड़ है...खासकर ध्रुव ने इस कॉमिक्स में कई जगह बेहतरीन दिमाग लगाया है! द्विअर्थी संवाद आज की सच्चाई हैं...और इनका प्रयोग भी कहानी को कई अच्छे हास्य के पल देता है! फाइटर टोड्स ने जगह जगह अपनी भोली बातों से बलमा के साथ एक अच्छी कॉमेडी पेयरिंग बनाये रखी!

Story-4/5
Artwork-3/5

Artwork View- स्तुति मिश्रा जी ने इस कॉमिक्स का चित्रांकन किया है! वस्तुतः कॉमिक्स अच्छी बनी है...परन्तु "समुद्री लुटेरे" की तुलना में 19 है! नागराज और ध्रुव के शरीर अच्छे नहीं बन पाए हैं...अनुपातिक रूप से कई जगह टेढ़े मेढ़े बने हैं...पेज-12,18-19,26 और बाद में 50वे पेज से अंत तक चित्रों का स्तर नीचे ही जाता रहा है! तुलनात्मक रूप से फाइटर टोड्स का आर्ट ठीक लगता है!
फिर भी कॉमिक्स आँखों को सुकून देती है.
अभिषेक सिंह द्वारा रंग संयोजन किया गया है...जो सामान्य है...उन्हें कुछ और नए आइडिया इस्तेमाल करने चाहिए...जिससे अलग आयामों में होने का एहसास दिखाई दे! इसके अलावा कॉमिक्स ठीक है..रंग खिले-खिले लगते हैं!
शब्दांकन- नीरू और सुखबीर जी द्वारा है.

नितिन मिश्रा जी ने इस बार Narration dialogues का भी इस्तेमाल कहानी में किया है...जो सामान्यतः वो उपयोग नहीं करते हैं....और यकीन मानिए यह बहुत सकारात्मक पक्ष रहा है! इससे कहानी को पढने में अधिक मज़ा आता है और तेज़ी से हो रहे बदलाव समझना ज्यादा आसान हो गया है! वो आगे भी इसको कहानियों में बनाये रखें!

यह कॉमिक्स इस सेट में सबसे अच्छी कॉमिक्स थी...और यादगार फंतासी जर्नी थी...समुद्री लुटेरों और हमारे हीरोज़ के बीच में दमदार टक्कर का मज़ा चुटीले हास्य संवादो के साथ लीजिये!

Tuesday, 28 January 2014

POPAT MEIN JAAN



पोपटलाल अर्रर मतलब बांकेलाल का यह नया विशेषांक प्रस्तुत हुआ है नाम है “पोपट में जान”!
साल 2013 बांकेलाल के लिए काफी अच्छा रहा है! हर सेट में उसको जगह मिलती है और कई कहानियां भी बेहतरीन बनी हैं! वहीँ इस साल तो उसका एक महा विशेषांक भी आपको अगले सेट में मिलेगा!
पोपट में जान का कथावस्तु कुछ यूँ है- बांकेलाल को शक होता है कि विक्रम की जान राजमहल के 5 पशुओं के अन्दर बंद है! पशु ख़त्म तो मोटा भी खत्म! आगे की कहानी आप समझ गए होंगे कि बांके ने सभी पशु मार देने हैं! पर हुआ वही-“कर बुरा हो भला!” यानी विक्रम नहीं मरे! अब क्यूँ नहीं मरे,कहाँ चूक हो गई,यह तो बांकेलाल का रेगुलर पाठक वर्ग खुद ही समझदार है!

“पोपट में जान” में नया कुछ नहीं है! वही घिसा हुआ तिकड़मी प्लाट..कहानी भी साधारण रह गई और पूरी तरह से बांकेलाल पर निर्भर भी! सह भूमिकाओं में किसी को तवज्जो नहीं मिली..सभी एक बार चेहरा दिखाकर चलते बने! एक नई किरदार “धाय माँ” लाइ गई जो पकाऊ निकली..शायद दोबारा कभी आगे फिर दिखेगी(बोला तो ऐसा ही गया है)!
इस कहानी की गति कछुवे जैसी है....आप आराम से चाय-पकोड़े खत्म कर लेंगे और आपको पता भी नहीं चलेगा कि कब पूरी हो गई!
कहानी का हास्य पक्ष बहुत कमजोर है...एक बार भी दीदा फाड़ हंसी नहीं निकलती! बांकेलाल सीरीज के साथ यही पेंच रहते हैं....हर सेट में कॉमिक्स आती है इसलिए बीच-बीच में ऐसी नाकाम कहानियां भी मिल जाती हैं..खैर अब दर्शन दो यमराज का इंतज़ार करें!

कहानी-2/5
आर्टवर्क-3/5

सुशांत पांडा जी का है-रेगुलर वाला(ना ऊपर ना नीचे)
इंकिंग-फ्रेंको.
..कलर-बसंत जी...कैलीग्राफी सुखवीर!
एक और महत्पूर्ण सूचना कि “पोपट में जान” के लिए RC ने इस बार बहुत निम्न कोटि के पीताम्बर रंग के कागज़ का प्रयोग किया है!हमने 50-60 कॉमिक्स के ढेर में से बहुत मेहनत से कुछ थोड़े अच्छे कागज़ वाली कॉमिक्स छांटी! यानी पोपट में जान को पूरी तरह से इसी कागज़ पर प्रिंट करवाया गया है! इस कागज़ की उम्र बहुत कम है..ज्यादा आद्रता वाले इलाको में कॉमिक्स ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएगी! RC ऐसे कागज़ का प्रयोग बार-बार ना करे!

कॉमिक्स के मजबूत पक्ष-
*सुशांत जी के चित्र!
कॉमिक्स के कमजोर पक्ष-
*उबाऊ कहानी,हास्य की नगण्यता,ख़राब कागज़ का उपयोग

“पोपट में जान” विशेष उल्लेखनीय नहीं है....अगली कॉमिक्स का इंतज़ार करिए!


Monday, 30 December 2013

CHANDULAL


 Review-"चंदूलाल
"
चंदूलाल है एक ऐसी हास्य कथा जिसका केंद्र बिंदु है करवा-चौथ व्रत!
बांकेलाल सीरीज़ में करवा चौथ पर आधारित कई चित्रकथाएं लिखी जा चुकी हैं..जिनकी यही थीम मिलती है! यानी महारानी के व्रत भंग से महाराज की मृत्यु देखने का बांकेलाल का सपना सफल हो जाए!
थीम को अलग रखकर देखें तो प्रस्तुतीकरण नया है! कथा का नाम चंदूलाल पर जरूर है..लेकिन उसका किरदार अंत के कुछ पन्नों पर ही आता है! मुख्यतः कहानी, महल के अन्दर बांकेलाल द्वारा महारानी का व्रत तुडवाने की कोशिशों तथा विक्रम द्वारा व्रत को बचाने की चेष्टाओं के इर्द गिर्द चक्कर काटती रहती है!
40 पन्नों की इस कॉमिक्स की सबसे बड़ी मजबूती इसके संवादों में छिपी है! कम पन्नों में बहुत सरलता से एक बड़ी कहानी को पिरोया गया है! बांकेलाल की पिछली कुछ कॉमिक्स सबसे बड़ा सबक उन् लेखकों को दे रही हैं..जो कि 2-4 लाइन्स की थीम पर कई-कई पार्ट्स पाठको को जबरदस्ती थमाने के लिए लालायित नज़र आते हैं!
तरुण कुमार वाही–अनुराग जी चंदूलाल में 15 सालो पहले वाला स्वाद भरने में सफल नज़र आते हैं! इतनी कसी हुई,तेज़ गति से चलती कहानी पढ़कर हास्य प्रेमियों का मन गदगद कर उठता है...आप इस चीज़ को जरूर ध्यान में रखें, कि संवाद अधिक होने के बावजूद भी कहानी रफ़्तार से चलती है..यही लेखकों की विजय है!
यह कहानी विशेषकर उन् पाठको को पसंद आएगी...जो पत्नी व्रता हैं...या उन कुंवारों को जो शादी करने की अभिलाषा रखते हैं!
कहानी के कुछ बिंदु जो आकर्षक है...जैसे- दरबारियों का नृत्य प्रेम,मरखप-बांके संवाद,कुटनी के कुटिल वचनों की बरसात,शान्ति भवन प्रसंग तथा अजीबोगरीब देव व ऋषि!

कहानी-4.5/5
चित्रांकन-4.5/5

कहानी के मूड को भांपता गुदगुदाता चित्रांकन सुशांत पंडा जी का है..हास्य कॉमिक्स में सबसे बड़ी विशेषता लगनी चाहिए कि किरदारों के संवाद पर उनके चेहरे की भाव भंगिमाएं सटीक बैठें...इस कसौटी पर आर्टवर्क खरा उतरा है..उम्मीद है सभी को पसंद आएगा!
बसंत जी के इफेक्ट्स एवं फ्रेंको की इंकिंग है!

आखिर में चंदूलाल में जो स्तरीय काम राज कॉमिक्स ने दिया है..वही आगे जारी रखे...चंदूलाल का मनोरंजनात्मक पक्ष काफी मजबूत है! निसंदेह मनोरंजन की दृष्टि से यह अपने सेट में सबसे बेहतर साबित हुई है!

Tuesday, 1 October 2013

TAKBAK





Review-"तकबक"

बांकेलाल का यह हास्य विशेषांक तरुण कुमार वाही –अनुराग कुमार सिंह द्वारा लिखा गया है!
कहानी का सार कुछ यूं है-
सभी भक्त अपने ईष्ट से हमेशा कुछ ना कुछ मांगते ही रहते हैं..भक्त अगर बांकेलाल जैसा हो तो भगवान् भी हमेशा चौकन्ने रहते हैं! इस बार कहानी में पंगा यह डाला गया है,कि शिवजी सामने से आकर बांकेलाल को विक्रम सिंह को मारने की युक्ति बता रहे हैं! इसलिए बांकेलाल अति प्रसन्न है! यानी इस बार बांकेलाल की जीत के अवसर पूरे हैं! कहानी में खलनायक है तकबक “नाम” का एक इच्छाधारी सर्प! यानी यहीं वो चाबी है जो विक्रम की मौत के दरवाज़े का ताला खोलेगी!
# क्या तकबक विक्रम को मार सका?
# शिवजी ने आखिर बांकेलाल को ऐसी योजना क्यूँ बताई?क्या उन्हें आखिर बांकेलाल पर दया आ ही गयी या फिर छुपा है कोई रहस्य?  

# क्या इस बार बांकेलाल को शिवजी का आशीर्वाद मनोवांछित फल दे पाया?
इन सवालों के जवाब आपको कहानी में मिलेंगे!

कहानी शुरू होते ही रफ़्तार से भागती है! पेज-3 पर ही बांकेलाल अपनी योजना शुरू कर देता है जो आखिर तक तकबक-विक्रम का आमना-सामना होने तक बनती रहती है! यानी चाल दर चाल! कुछ चीज़ें जो हमेशा की तरह हर कहानी जैसी इसमें भी डाली गयी है..वो हैं...मरखप का बांके की जासूसी करना,महल में फैला भ्रष्टाचार,मंत्रियो की करतूतें,रानी स्वर्णलता की बे-सिर पैर बातें और विक्रम का बांके पर हमेशा की तरह अटूट विश्वास!
क्यूंकि कहानी सिर्फ तकबक के विक्रम को मारने वाले पहलु पर ही घूमती है,इसलिए इसमें दूसरा कोई अतिरिक्त छोर कहानी के साथ नहीं जुडा मिलता है! कहानी के एक तरफ से आरम्भ होकर बिना कहीं भटके दूसरी तरफ अंत आ जाता है!
किरदारों की बात करी जाए तो बांकेलाल और विक्रम सिंह ने खुद को दोहराया ही है,दोनों के सभी संवाद और सीन हमेशा से चलती आ रही कहानियों जैसे ही हैं..कई बार पाठक खुद ही जान जाते हैं कि दोनों का अगला रिएक्शन क्या होगा!
भगवान् शिव और तकबक के सभी सीन जानदार बने हैं..और कहानी का अकेला आकर्षण हैं!
हास्य के मामले में कहानी साधारण रही है! इसमें चुटीले संवादों और मसालों की कमी दिखी! लेखको को हास्य पर और ज्यादा ध्यान देना चाहिए! 40 के मूल्य में कहानी अगर हंसा ना सके तो सब व्यर्थ लगता है! बांकेलाल की कहानी से सबसे ज्यादा उम्मीद यही रहती है कि वो पढने वालो को कुछ अच्छे मनोरंजक पल दे जाए!

कथा-3/5
चित्रांकन-4/5

सुशांत पंडा जी द्वारा बनाया गया चित्रांकन है जो अच्छा बन पड़ा है! भगवान् शिव और तकबक पर किये गए प्रयास अच्छे हैं..बाकी सभी हमेशा जैसे ही है!
पेज-6 का प्रथम फ्रेम कमाल का लगता है,जब बांकेलाल मरखप की उंचाई तक आने की चेष्टा कर रहा है! इसके अलावा भूमिगत महल के अन्दर के दृश्य भी रेखांकित करने लायक हैं!
इंकिंग “फ्रेंको” की और रंग संयोजन बसंत पंडा जी का है!
टिप्पणी- तकबक अति उल्लेखित होने लायक नहीं बन पाई है...लेकिन एक औसत विशेषांक कहा जा सकता है! इसका सिर्फ बांकेलाल के षड्यंत्रकारी जीवन में एक पन्ना और जोड़ने तक का ही महत्व है!

Sunday, 19 May 2013

PREM PARIKSHA





कहानी-4/5
आर्टवर्क–4/5


प्रेम यानी “इश्क वाला Love”,
मोहब्बत, माहिया, प्रीत, खुदा की इबादत,.....हर प्रेमी को अपने प्यार के लिए एक पर्यायवाची शब्द खुद ही मिल जाता है!
ये कहानी है प्रेम की परीक्षाओ की.... पूरे विशालगढ में सिर्फ एक ही ऐसा मुख्य प्रेमी जोड़ा है...जी हाँ...विक्रम सिंह और रानी स्वर्णलता का! और चूंकि अपने बांकेलाल जी आज तक “वेल्ले” हैं....राज कॉमिक्स को उनके लिए भी कुछ सोचना चाहिए...इस बार अपना बोदीवाला ..पति-पत्नी के बीच फिर से रचता है एक नई चाल..और बांके को साथ लेकर विक्रम सिंह को सामना करने जाना पड़ता है..अपने सच्चे प्रेम को साबित करने खतरनाक परीक्षाओ की कड़ी से..जिसका रास्ता है एक तिलिस्मी गुफा में.. जो है प्रेमिओं की हत्यारी भी...
1-क्या बांके इसबार सफल हो पाया?
2-क्या विक्रम अपने प्रेम को सच्चा साबित कर पाए?
3-इस तिलिस्मी गुफा का क्या रहस्य था ?
इसको जानने के लिए प्रेम की अदभुत परीक्षाओ का हँसते ठहाके लगाते हुए रसा स्वादन करिए इस विशेषांक में !

इस बार 43 पृष्ठ की इस किताब का मुख्य आकर्षण है..संवादों (डायलॉग्स) की बहुतायत होना! ज्यादा संवाद होने की वज़ह से कहानी और हास्य के बीच में एक बैलेंस पूरी तरह कायम रहा है..इससे फायदा यह रहा है..की जहाँ कहानी कि रोचकता बनी रहती है..वहीँ हंसने के भरपूर मौके भी पाठक प्राप्त कर लेते हैं!
संवाद पूरी तरह से भारतीय शैली में लिखे गए है...अंग्रेजी का मिश्रण नहीं हुआ है...जो सराहनीय है!
डायलॉग्स और वस्तुओ,कलाओं के नामो में लेखको ने कोबी-भेड़िया की “अमर-प्रेम सीरीज” से कई यादगार नामो का चुनाव किया है!
एक जरूरी बात जो फिर से सही नहीं लगी वो है..पृष्ठ-14 पर बांके–विक्रम के बीच हुआ मोबाइल फ़ोन संवाद! यह चीज़ें छोटी लगती हैं..लेकिन कहानी के यथार्थ के धरातल पर होने में प्रश्नचिन्ह लगा देती हैं! इन त्रुटियों को ठीक करा जाना आवश्यक है!



सुशांत पांडा जी ने फिर से कातिलाना काम दिया है...सुन्दरता से ओत-प्रोत एवं पूरी तरह कहानी के भावार्थो को दर्शाता भाव पूर्ण चित्रण हुआ है! तिलिस्मी गुफा के अन्दर दो देवियों पर उनका विशेष प्रयास रेखांकित करने लायक है! इसमें संदेह नहीं..सुशांत जी के कारण ही बांकेलाल सीरीज अभी भी पुराने रंग रूप में मिलती है!
बसंत जी का रंग संयोजन भी उम्दा है!
राज कॉमिक्स से भी निवेदन है कि अच्छे लेखको की प्रेम पर आधारित कहानियां ज्यादा से ज्यादा निकालें!
अगर आपके दिल में भी किसी ख़ास के लिए प्रेम भावनाओं का सागर हिलोरें लेता है...तो “प्रेम परीक्षा” आपको जरूर पसंद आएगी!