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Sunday, 19 May 2013

VEERGATI





कहानी-5/5
आर्टवर्क-4.5/5


आर्डर ऑफ़ बेबल,न्यू वर्ल्ड आर्डर और वर्ल्ड वार पूरी करने के बाद आतंकहर्ता नागराजकी जर्मनी यात्रा का अंतिम पड़ाव वीरगतिआपके समक्ष प्रस्तुत है!
वर्ल्ड वारकी कहानी तक आप सभी जान चुके है, कि विश्व युद्ध अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच चुका है और अब आतंकवाद को अपनी भीषण प्रतिक्रिया दिखाने के लिए नागराज सिर पर कफ़न बांधकर निकल चुका है! इस विकराल परिस्थितियों में उसके साथ कुछ जोशीले साथी भी कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहे हैं!

हमारा मत है कि अब तक किसी भी राज कॉमिक्स सुपर हीरो की कॉमिक्स में ऐसे मौके विरले ही देखने को मिले हैं,जबकि वो अपने दुश्मनों के साथ-साथ अपने संगी-साथियों के अलावा खुद अपने आप से भी इस बात से अनभिज्ञ है..कि वो जो कुछ भी करने वाला है...उसकी अंतिम परिणीती क्या रहेगी? इसका तात्पर्य यह है कि एक महान व्यक्तित्व जब निजी संबंधो और रिश्तो से बहुत ऊपर उठ जाता है...तभी विश्व रक्षक और विश्व प्रिय बन पाता है!

विश्व युद्ध कि जो विभीषिका पूरे संसार पर कहर बनकर टूट चुकी है...उसको अकेले थामने का ज़िम्मा लिए आतंक हर्तानिकलता है-यू एस ए,सऊदी अरब दुबई,रूस,फ्रांस,इटली,मिस्र होते हुए बेबीलोन की धरती पर! इस लम्बे सफ़र में बिना थके और बिना रुके चलता और लड़ता हुआ नागराज कितना भीषण शारीरिक और मानसिक दबाव एवं पीड़ा झेल रहा है..यह आसानी से दिख जाता है!
इस खूनी सफ़र के अंत पर नागराज का सामना है उन्ही से जो उसके अपने प्रिय हैं...यानी इच्छाधारी नाग जाति!
बुरी तरह से टूट चुके और व्यथित नागराज को इस विपरीत परिस्थिति में जब लेखक उसकी माँ ललिता देवी के आँचल की छाँव देते हैं (पेज-52-56) तो यह चार भावपूर्ण पृष्ठ पूरी कॉमिक्स पर भारी साबित हो जाते हैं!

खलनायको की पराजय के प्रसंग आप विशेषांक में पढ़ लीजियेगा!

लेखक ने जिस तरह से कहानी के संवाद लिखे हैं...कहानी के अलग-अलग प्रथक हिस्सों को आपस में एडजस्ट किया है...और पाठको को दुःख के सागर में डुबो दिया है वो अभूतपूर्व है!
(पेज-72-73) विशेष रूप से रेखांकित किये जा सकते हैं...जहाँ मरता हुआ नागराज सौडांगी की गोद में अपनी अंतिम उखड़ती साँसों से विसर्पी को अपने प्रेम के अधूरे शब्द ही दे  पाता है ! नितिन मिश्रा जी ने हर प्रशंसक को भाव विभोर कर दिया !
खैर यह विशेषांक एक्शन और इमोशनल Mixup है! ऊपर आपको पता चल चुका है कि यह कहानी रुलाने में कामयाब रही है..लेकिन हम पाठको को इस बात कि भी 100 % तसल्ली दे रहे हैं..कि यह कहानी जर्मनी में पनपे आतंक के पेड़ को उखाड़ने के अपने मूल कथानक पर भी पूरी तरह खरी उतरी है! वर्ल्ड वार के पूरे होने तक जो कई सवाल अनसुलझे थे..वे सभी वीरगतिमें अच्छी तरह से सुलझ चुके हैं..अब क्यूंकि कहानी पूरी हो चुकी है..तो पाठक टैली करके कहानी में जो समझ नहीं आया..उसको जान सकते हैं...जो इस तरह हैं...

1-      नागराज को जर्मनी बुलाने के लिए शिकाता गा नई के अंत में जो विडियो फुटेज दिखाया गया था..वो न्यू वर्ल्ड आर्डर ने क्यूँ दिखाया?
उत्तर- वीरगति- (पेज-39)
2-      1945 में नागांधर की मौत का नागराज के आर्डर का मसीहा होने से क्या ताल्लुक है?
उत्तर- वीरगति- (पेज-26) और (पेज-59)
3-      न्यू वर्ल्ड आर्डर के अंतिम पेज पर नागराज और लेइत्फ़ेन्दे के बीच क्या बातें हुई?
उत्तर- वीरगति- (पेज-30-40)
4-      पेड्रो की भूमिका का खुलासा किया जाए?
उत्तर- वीरगति- (पेज-33)
5-      लोला के पीछे न्यू वर्ल्ड आर्डर क्यूँ पड़ा है?..लोला आर्डर ऑफ़ बेबल ग्रुप से किस प्रकार जुडी है?..उसके हाथ के बर्थ मार्क की क्या कहानी है? और अब वो कहाँ गायब है?
उत्तर- वीरगति- (पेज-68-70)
6-      1945 में सूथसेयेर के पास 2 बच्चे थे...जिनमे एक लार्ड मोर्बिअस बना...हंटर के पास वाला बच्चा कहाँ गया?
उत्तर- वीरगति- (पेज-69)
7-      परम पिता ने जिस निमरोद को बिजली से भस्म कर दिया..वो किस प्रकार आज भी जीवित है?
उत्तर- वीरगति- (पेज-34-35)
8-      OOB में पेज-56 पर बेहोश नागराज को लोला के घर कौन ले गया था?
उत्तर- वीरगति- (पेज-33)
9-      OOB में सबसे पहले हंटर को नागराज को मारने का आदेश किसने दिया था?
उत्तर- वीरगति- (पेज-34)
10-    OOB में पेज-34 पर नागराज को मिले मोबाइल में क्या था?
उत्तर- वीरगति- (पेज-33)
वीरगति ने हमें पूरे अंक देने पर मजबूर किया है..क्यूंकि यह उम्मीद से कहीं ज्यादा बेहतरीन साबित हुई! जितने प्रश्न प्रस्तावित  थे..उससे कहीं ज्यादा उत्तर लेखक से दिए हैं!  


हेमंत कुमार जी अब पूरी तरह से नागराज पर महारत ले चुके हैं..जिसका सुबूत वीरगति में भी मिलता है...एक अच्छे पेंसिलर की यही खूबी होती है..कि वो हर परिस्थिति को बराबर तरह से संभाल सकता हो...हेमंत जी ने जहाँ विश्व युद्ध के शानदार दृश्यों को बनाया है...वही नागराज के अंतिम सफ़र के सभी side characters के साथ emotional चेहरों के हाव भाव पर भी 100% उम्दा काम किया है...ललिता देवी वाले चित्र तो यादगार हैं...इस सीरीज कि सफलता में हेमंत जी का बराबर का योगदान है!
इंकिंग के स्तर से आश्वस्त रहा जा सकता है कि ईश्वर जी बहुत मेहनती आर्टिस्ट हैं...उनका काम प्रशंसनीय है!
राज कॉमिक्स का धन्यवाद कि एक बात फिर से कलर इफेक्ट्स की वापसी कॉमिक्स में हुई है...वीरगति में बहुत परा शक्तियों और युद्ध के दृश्य हैं...उनको प्रभावशाली बनाने में शादाब जी की मेहनत का भी हाथ रहा है!
मंदार गंगेले जी ने शब्दांकन में हर मुख्य पात्र के अनुसार अलग बदलाव किये हैं...जहाँ डायलॉग्स की इंटेंसिटी के हिसाब से Bubbles में भी changes हैं...निमरोद के लिए काले bubbles का उपयोग करना एक अच्छा step था!

सीरीज और समीक्षा दोनों पूरी हुई! यह कॉमिक्स एक बार फिर साबित करती है..कि अंत भला तो सब भला !
आर्डर ऑफ़ बेबल सीरीज पिछले कुछ सालों में आई सबसे बेहतरीन सीरीज साबित हुई! नितिन मिश्रा जी बधाई के पात्र हैं!
इस पूरी सीरीज को खरीदकर जरूर पढ़ें!

SHUBHASYA SHEEGHRAM




कहानी-3/5
आर्टवर्क-3/5

शुभस्य शीघ्रम..इसका अर्थ है... शुभ काम करने में देर ना करें
प्रथम भाग रावण डोगापढ़ चुके पाठक जानते हैं..कि मुंबई में रावण के उप नाम से कुख्यात  हो चुके डोगा को अब तलाश है उस असली शख्स की..जो अवैध फाइट क्लब्स को संचालित करता है और अभी तक उसकी नजरो में आकर भी बचा हुआ है!
इस पूरी धमा चौकड़ी में धनिया चाचा की जान अस्पताल में ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रही है! पिछली कुछ सीरीज में सूरज के प्रिय जनों पर लगातार हुए हमलो के बाद हुई अस्पताल यात्रा के बाद डोगा को फिर एक बार जुनूनी मौका मिलता है..कि वो खलनायक की सरगर्मी से तलाश करे!
कहानी के आधे पन्ने रावण डोगामें दिखाए जा चुके डोगा के हाथो हुए कत्लेआमो को दुबारा रिपीट/रीप्ले करने में चले गए हैं...यह जोड़ते हुए कि डोगा ने किसको क्यूँ और कैसे मारा!
कहानी साधारण राह पर शुरू होती है..और एक समान गति से चलती जाती है...इसमें परिवर्तन सिर्फ अंत में तब आता है जब सारी मिस्ट्री की हिस्ट्री खुलती है और कहानी तभी समाप्त हो जाती है!
कहानी का मजबूत पक्ष डायलॉग्स हैं..जो चिर परिचित डोगा शैली के हैं..यानी भारी भरकम धमकियाँ देकर हड़काना और रक्तचाप को ऊंचा करने वाले...जिनको लेखको ने बड़ी मेहनत से लिखा है..और जिनके कट्टर डोगा प्रेमियों को पसंद आने की पूरी सम्भावना है!
धनिया चाचा शुरू में ही स्टोरी से आउट हो जाते हैं..और दूसरा मुख्य पात्र रॉकी सिर्फ अंत के 2-3 पेजों में नज़र आता है! इसके बाद रावण डोगाका स्वाद ले चुके पाठक आसानी से जान जायेंगे कि अब बचा कौन जो डोगा के हाथ पिटेगा? फिक्र की जरूरत नहीं..अगर नहीं पता लगा तो यह कहानी आप जैसे सुधी पाठको को ध्यान में रखकर ही लिखी गई है..इसे पढ़कर जरूर जानियेगा!



प्रथम भाग के औसत चित्रांकन की तुलना में शुभस्य शीघ्रम को  धीरज वर्मा जी ने मजबूती दी है....गौर से देखनी वाली बात यहाँ भी है..कि पूरी कॉमिक्स को एक समान नहीं माना जा सकता..आर्टवर्क में जगह जगह पर ऊँच नीच होती जाती  है...एक बड़ी कमी शरीरों के Proportions में दिखती है..जहाँ हाथ-पैर छोटे लगते हैं जबकि बाकी शरीर लम्बा! यह कमी हर उस सीन में है जहाँ डोगा पूरे शरीर में दिखाया गया है!
निसंदेह कॉमिक्स में फाइटिंग के जबरदस्त सीन बनाये गए हैं..लेकिन ना डोगा और ना सूरज का चेहरा अच्छा बना है!..पेंसिल के Dull Strokes कलरिंग इफेक्ट्स के बाद भी उभर कर नज़र आते हैं...यह कॉमिक्स एक और उदाहरण देती है..कि धीरज जी की पेंसिल बिना इंकिंग के हमेशा अधूरी ही रहेगी..कलरिंग उसको सहायता नहीं दे पा रही! भक्त रंजन जी ने इफेक्ट्स शानदार दिए हैं..लेकिन नॉन-इंक कॉमिक्स की कमियां नहीं छुपा सके.
पूरी मेहनत से किये गए आर्टवर्क का नतीजा औसत रहा हैधीरज जी का नाम होने से उम्मीदें बहुत बढ़ जाती हैं...उनका बेस्ट वर्क हर फैन की आँखों में बसा हुआ है! और हमें विश्वास है कि बहुत जल्द वो वापस पुरानी रंगत में लौट आयेंगे!
50 रूपए में बनी 75 पेज की एक चित्रकार द्वारा बनाई गई हिट सिंगल कॉमिक्स 30+40 =70 रुपये और 46+47=93 पेज के 2 औसत भाग से ज्यादा मनोरंजन देने वाली सफल कहानी होती! यहाँ 18 पेज ज्यादा लग जरूर रहे हैं...लेकिन वह आसानी से तब कवर किये जा सकते हैं..जब कहानी के 2 भाग में होने के चलते एक ही दृश्य को 2 बार बनाना ना पड़े..जैसे ऊपर हमने बताया हुआ है..
राज कॉमिक्स से विनम्र निवेदन है कि इस 2 भाग कि सीरीज से यह सन्देश लें कि..ऐसी कहानियां एक ही भाग में पूरी कर दी जाएँ तो ज्यादा मनोरंजक और सफल बनेंगी! कॉमिक्स ऐसी हो...जिसके आर्टवर्क और कहानी पर पैसा खर्च करने के बाद यह अलफ़ाज़ खुद निकल जाए..कि पैसा वसूल करवा दिया कॉमिक्स ने!
लेखको से भी विनती है..कि जब आज के समय में महीनो-सालो के इंतज़ार के बाद एक हीरो की कोई नई  कॉमिक्स मिलती है..तो उसका सफल होना तभी माना जाता है जब वो बार-बार पढने का मन बना दे...अगर सिर्फ एक बार पढ़कर फिर सालो तक उसको दुबारा खोलने का दिल नहीं करे..ऐसे में लेखको का दायित्व है कि वो दोगुने जोश और मेहनत से एक नई शुरुआत करके पाठक का दिल जीतें !

PREM PARIKSHA





कहानी-4/5
आर्टवर्क4/5


प्रेम यानी इश्क वाला Love,
मोहब्बत, माहिया, प्रीत, खुदा की इबादत,.....हर प्रेमी को अपने प्यार के लिए एक पर्यायवाची शब्द खुद ही मिल जाता है!
ये कहानी है प्रेम की परीक्षाओ की.... पूरे विशालगढ में सिर्फ एक ही ऐसा मुख्य प्रेमी जोड़ा है...जी हाँ...विक्रम सिंह और रानी स्वर्णलता का! और चूंकि अपने बांकेलाल जी आज तक वेल्ले हैं....राज कॉमिक्स को उनके लिए भी कुछ सोचना चाहिए...इस बार अपना बोदीवाला ..पति-पत्नी के बीच फिर से रचता है एक नई चाल..और बांके को साथ लेकर विक्रम सिंह को सामना करने जाना पड़ता है..अपने सच्चे प्रेम को साबित करने खतरनाक परीक्षाओ की कड़ी से..जिसका रास्ता है एक तिलिस्मी गुफा में.. जो है प्रेमिओं की हत्यारी भी...
1-क्या बांके इसबार सफल हो पाया?
2-क्या विक्रम अपने प्रेम को सच्चा साबित कर पाए?
3-इस तिलिस्मी गुफा का क्या रहस्य था ?
इसको जानने के लिए प्रेम की अदभुत परीक्षाओ का हँसते ठहाके लगाते हुए रसा स्वादन करिए इस विशेषांक में !

इस बार 43 पृष्ठ की इस किताब का मुख्य आकर्षण है..संवादों (डायलॉग्स) की बहुतायत होना! ज्यादा संवाद होने की वज़ह से कहानी और हास्य के बीच में एक बैलेंस पूरी तरह कायम रहा है..इससे फायदा यह रहा है..की जहाँ कहानी कि रोचकता बनी रहती है..वहीँ हंसने के भरपूर मौके भी पाठक प्राप्त कर लेते हैं!
संवाद पूरी तरह से भारतीय शैली में लिखे गए है...अंग्रेजी का मिश्रण नहीं हुआ है...जो सराहनीय है!
डायलॉग्स और वस्तुओ,कलाओं के नामो में लेखको ने कोबी-भेड़िया की अमर-प्रेम सीरीजसे कई यादगार नामो का चुनाव किया है!
एक जरूरी बात जो फिर से सही नहीं लगी वो है..पृष्ठ-14 पर बांकेविक्रम के बीच हुआ मोबाइल फ़ोन संवाद! यह चीज़ें छोटी लगती हैं..लेकिन कहानी के यथार्थ के धरातल पर होने में प्रश्नचिन्ह लगा देती हैं! इन त्रुटियों को ठीक करा जाना आवश्यक है!



सुशांत पांडा जी ने फिर से कातिलाना काम दिया है...सुन्दरता से ओत-प्रोत एवं पूरी तरह कहानी के भावार्थो को दर्शाता भाव पूर्ण चित्रण हुआ है! तिलिस्मी गुफा के अन्दर दो देवियों पर उनका विशेष प्रयास रेखांकित करने लायक है! इसमें संदेह नहीं..सुशांत जी के कारण ही बांकेलाल सीरीज अभी भी पुराने रंग रूप में मिलती है!
बसंत जी का रंग संयोजन भी उम्दा है!
राज कॉमिक्स से भी निवेदन है कि अच्छे लेखको की प्रेम पर आधारित कहानियां ज्यादा से ज्यादा निकालें!
अगर आपके दिल में भी किसी ख़ास के लिए प्रेम भावनाओं का सागर हिलोरें लेता है...तो प्रेम परीक्षाआपको जरूर पसंद आएगी!

Thursday, 25 April 2013

RAVAN DOGA




Overall rating 
 
1.3
story 
 
1.5
artwork 
 
1.0
 
कवर पर 10 सिर वाला डोगा..कॉमिक का नाम “रावण डोगा”..अगर पाठक यह सोचे की कहानी का लिंक किसी प्राचीन युग में घटी किसी घटना से है..जिसके तार आज डोगा से जुड़ गए हैं..तो यह 100 % गलत निकलेगा..ऐसा कुछ नहीं है!
कहानी का नाम और असली कहानी आपस में कोई मेल नहीं रखते...रावण डोगा का यह निरर्थक और सनसनीखेज नाम पाठको को एक पल के लिए आकर्षित करने की कोशिश के तहत मिला है..और इसकी कुछ वज़हें हैं जो आप आगे जानेंगे कि क्यूँ?

कहानी का केंद्र है...मुंबई...जिसमे छोटे-बड़े स्तर पर चल रहे हैं कई अवैध फाइट क्लब्स, जिनमे होने वाली खूनी जंगें..लड़ाइयाँ..जिनकी वज़ह से युवा वर्ग में अराजकता फैली हुयी है...इसमें डोगा समाज के कुछ बड़े और आदरणीय समाज सेवियों को मारता/अपहरण करता नज़र आता है...जिसकी वज़ह से उसकी कार्यप्रणाली प्रश्नचिन्ह के घेरे में है! इस बीच “लायन डेन” बंद और घनिया चाचा का एक होनहार शिष्य “रॉकी” पागलखाने में जा चुका है..और हर 4 पेज पर एक नयी फाइट शुरू हो जाती है...कहानी क्रमशः

लेखकों में अभी (2013) भी डोगा के लिए ऐसे repeated और घिसे पिटे story plots लिखते रहने की रूचि बाकी है...बहुत आश्चर्य की बात है...गली मोहल्ले में चलते फाइट क्लब्स का आईडिया सालो पहले सुपर कमांडो ध्रुव की “कमांडो फ़ोर्स” के जमाने में आता था..कहानी में थोड़ी सी हेर-फेर करके किसी किसी दूसरे हीरो को रखकर एक नयी कहानी लिख देने की प्रवृति अब लेखकों को छोड़ देनी चाहिए..यह कलाकारी पाठको पर काफी पहले उजागर हो चुकी है!

रावण डोगा में लेखकों को कहानी का सस्पेंस बचाए रखने में भी मशक्क़त करनी पड़ती है...रॉकी का पागल होना और ब्लैक टर्र्रमिनेटर का नज़र आना आपस में जुडी बातें...डोगा के बड़े बड़े शिकार ही बड़े बड़े मगरमच्छ हैं..दूसरी बड़ी बात! दुनिया में समय कितना बदल चुका है ...कहानियां कहाँ से कहाँ पहुँच गयीं...प्रोफेशनल लेखक एक से एक नए आईडिया लिखते हैं....की पढने वाला अपना दिमाग घुमा चुका होता है..वहीँ इस तरह बीच में ऐसे कांसेप्ट मिलना बहुत अखरने वाली चीज़ है!
यानी पाठक को शुभस्य शीघ्रम पढने की क्या वज़ह लेखक देना चाहेंगे?? सिर्फ इतना की कहानी का आधा हिस्सा उसमे है...अफ़सोस!

बहरहाल रावण डोगा की तरह 46-46 पेज की २ कहानियां अलग अलग आती हैं..तो उनकी बर्बादी निश्चित है...अगर यह सिंगल शॉट कॉमिक बनती..और सम्पादन पर थोडा ध्यान दिया जाता..तो कहानी थोडा मनोरंजन दे सकती थी...लेकिन ऐसा हुआ नहीं! कहानी के डायलॉग्स में कोई नयापन नहीं है !अगर 46 पेजेज को पढना भारी लगने लगे..इतना काफी है समझने के लिए कि लेखक को पाठको के मनोभाव परखने में त्रुटि हुई है !


आर्टवर्क-


रावण डोगा का चित्रांकन और भी ज्यादा निराशाजनक है..सिद्धार्थ पंवार(पेंसिल) और संजीव शर्मा (इंकिंग) ने दोयम दर्जे का काम रावण डोगा में किया है...आर्टवर्क की ऐसी मिटटी-पलीत हाल फिलहाल किसी कॉमिक्स में नज़र नहीं आती..वो भी तब जब डोगा एक बड़ा हीरो है.. और एक फिल्म भी उसपर बनने वाली है... उसके साथ ऐसा व्यवहार दर्दनाक है! यदि किसी नए पाठक ने “रावण डोगा” को उठाकर देख लिया तो बड़ा की नकारात्मक असर पड़ेगा..क्यूंकि आज कला के क्षेत्र बहुत विस्तृत है..कामचलाऊ चीज़ें बाज़ार में ज्यादा टिकती नहीं! आर्टवर्क इस तरह समझा जा सकता है..की अगर कॉमिक्स में कलरिंग ना होती..तो कोई भी कॉमिक्स में जान नहीं पायेगा..की कौन सा किरदार किस फ्रेम में खड़ा है!

रंगरेज़ (रंग संयोजन) की हालत वही है..औसत से नीचे बने चित्रांकन पर रूखी-सूखी फ्लैट कलरिंग...वैसे यह ख़ुशी की बात ज्यादा लगी..कि कलरिस्ट ने “रावण डोगा” पर इफेक्ट्स देने में अपना कीमती समय बर्बाद नहीं किया...कहानी और आर्टवर्क की हालत जब दोयम दर्जे की हो..तब रंगों को A+ क्वालिटी का रखना अक्लमंदी थी भी नहीं !
रावण डोगा पढने की कोई एक ठोस वज़ह किसी को मिले तो जरूर बताये!
शुभस्य शीघ्रम

CODE NAME COMET


Overall rating 
 
4.0
story 
 
4.0
artwork 
 
4.0




अनुपम सिन्हा जी की अनुपस्थिति में सुपर कमांडो ध्रुव की एक ऐसी 4 भाग लम्बी कहानी...कॉमिक्स को बनाने से लेकर पाठको के हाथो में देने तक लगने वाली ऊर्जा अपने आप दिखने लगती है !यह भारतीय कॉमिक्स जगत का वो काम है,जिसमे लाख सावधानी रखने के बाद भी हाथ नहीं जलेंगे..इसकी कोई गारंटी नहीं है!..लेखक मंदार गंगेले इस काम में कहाँ तक सफल हो पायेंगे यह अभी बहुत दूर का प्रश्न है..इसलिए जल्दबाजी ना करते हुए इस प्रथम भाग पर प्रकाश डाला जाए!
आजकल सोशल साइट्स की वर्चुअल दुनिया में विज्ञापन देने का जमाना है...कॉमिक्स के आने से काफी समय पहले से previews मिल जाते हैं..और कहानी को लेकर बहुत सारे कयास और पूर्वानुमान भी लगाये जाते हैं..इतना सब होने के बाद कॉमिक्स आने पर छिपाने लायक बहुत कम चीज़ें बचती हैं..जिनमे पाठक यह देख सकता है कि जो सोचा था,देखा था..क्या वैसे ही हुआ या कुछ नया मिल गया !

“कोड नेम कॉमेट” में फिलहाल ऐसा कुछ नज़र नहीं आएगा जिसपर सोचते हुए किसी के दिमाग पर बहुत जोर पड़े! कहानी ऊपर-ऊपर से बहुत सरल और आसानी से किसी निश्चल बच्चे की तरह भागती दिखाई देती है! अगर पहले की आई कहानियों से "कोड नेम कॉमेट" का अंतर खोजा जाए..तो कई धागों के बहुत सारे खुले सिरों को “कोड नेम कॉमेट” में जगह जगह पर लटकाया गया है..यानी पढ़ते हुए और आगे बढ़ते हुए पाठक उस सिरे को पकड़कर आगे चलना शुरू करेगा तो अभी 3 और भाग तक इंतज़ार में समय बिताना कहानी की डिमांड भी है और मजबूरी भी !

बहरहाल “कोड नेम कॉमेट” की शुरुआत वर्तमान से होती है...जो पहले फ्लैशबैक,फिर वर्तमान,फिर फ्लैशबैक और आखिर में फिर से वर्तमान पर आकर स्थिर हो जाती है ! यह चीज़ पाठको के लिए बहुत गौर करने और समझने वाली है...10-15 साल पहले लिखी कहानियां और आज लिखी जा रही कहानियों में यह एक मूलभूत फर्क नज़र आता है..कि आजकल कहानी को बीच में वर्तमान से कहीं किसी हिस्से से शुरू करा जाता है..और उसके बाद कहानी को बार बार आगे-पीछे फेंटा जाता है, जैसे ताश की गड्डी..कभी राजा ऊपर तो कभी जोकर..ऐसे में लेखक की शैली के अनुसार पाठक को अपना मन बदलना आना बहुत बड़ी जरूरत बन चुकी है ! लेखक ने सीन्स को लिखने और सही जगह पर उनका इस्तेमाल करने में मेहनत करी है....डायलॉग्स को भी सिंपल भाषा में रखने की पूरी कोशिश करी है..जिससे कहानी को पढने-समझने में ज्यादा दिमाग घुमाना ना पड़े...हाल प्रकांतर में जैसा कई दूसरी कॉमिक्स में कई बार देखा जा चुका है...कि कहानी को 2 -3 पढना पड़ता है...यह बात “कोड नेम कॉमेट” में नहीं है!

राज कॉमिक्स द्वारा फेसबुक पर लगाये गए 6 -7 प्रीव्यू पेजेस जिनमे ध्रुव मारा गया था..कॉमिक्स में आखिरकार झूठे ही साबित होते हैं...जिसका साफ़ मतलब निकलता है..ध्रुव मरा/गायब तो जरूर हुआ है..लेकिन किसी नयी घटना की वज़ह से! इस नयी घटना के पीछे कौन सा दिमाग काम कर रहा था?
क्या डॉक्टर वायरस? (नहीं..एक ही व्यक्ति 2 बार कैसे)..तो फिर क्या ग्रैंड मास्टर रोबो (जो सबके हिसाब से मरा हुआ ,लेकिन कहानी में जिंदा है)..या फिर नताशा?(जो रहस्यमय ढंग से काफी कुछ छुपाती लगती है)..या मीशा?(जो नहीं चाहती ध्रुव वापस अपनी दुनिया में लौटे)..या कोई नया चेहरा जो छुपा रुस्तम बना हुआ है?
इस सबके बीच “कॉमेट” को अपने परिजनों के सपने दिख रहे हैं...यानी वही ध्रुव है.?(नहीं-नहीं..क्यूंकि अगर ऐसा होता है तो -दुनिया के इतने मशहूर चेहरे,ब्रह्माण्ड रक्षक के अपराध विनाशक की वास्तविक पहचान छुपाना इतना आसान काम है..यानी “नीदर लैंड” से लेकर भारतीय सत्ता प्रतिष्ठानों पर घनघोर प्रश्नचिन्ह लग चुका है !
चलिए इन सवालों को भविष्य पर छोड़ देते हैं ! “कोड नेम कॉमेट” में सबके रोल्स पर आते हैं!

“सुपर कमांडो ध्रुव “–ध्रुव ही कॉमेट है..यह बात किसी से नहीं छुपी है..अगर लेखक का मन कुछ चमत्कार करने की ना सोचे तो! ध्रुव कॉमिक्स में एक नए रूप में सामने है..जिसमे उसकी मशहूर हेयर स्टाइल से लेकर चाल-ढाल,रहन-सहन,वेशभूषा सब कुछ बदल चुका है !
एक सिरे से चलती रही ध्रुव की सीरीज में इस तरह बीच में हो रहे यह experiments तारीफ के काबिल हैं...एक हीरो जिसकी याददाश्त गायब है...वो एक ऐसी जगह रह रहा है..जिसमे उसे सिर्फ अन्धकार नज़र आ रहा है..लेकिन फिर भी वो जुटा हुआ है अपराध उन्मूलन के अपने लक्ष्य को याद रखते हुए आज भी उसी ईमानदारी से पूरा करता हुआ,एक नए नाम,नए रूप में एक नए समाज के लिए! इतना काफी है यह समझाने के लिए कि सुपर कमांडो ध्रुव एक विश्वविख्यात सुपर हीरो क्यूँ है!

“रिचा/ब्लैक कैट” – “कोड नेम कॉमेट” में रिचा को खासतौर से रेखांकित किया जा सकता है ! लेखक ने रिचा की ज़िन्दगी के अनसुलझे हिस्सों को सुलझाने की बेहतरीन कोशिश करी है ! रिचा का ध्रुव से अपने रिश्ते पर बेबाक राय रखना..एक नयी जगह नौकरी के लिए जाना और ब्लैक कैट के रूप में अपराध रोकने की कोशिश उसके characterization के लिए पॉजिटिव signs हैं !जो उसकी अहमियत को ध्रुव सीरीज में एक मुख्य स्तम्भ के रूप में पुनः स्थापित करने में सहायक बनते हैं !

“श्वेता” –भाई न रहे तो उस बहन की हालत क्या होगी समझी जा सकती है! श्वेता के हिस्से में फिलहाल दुःख के बहुत ग़मगीन क्षण आये हैं! वो शोकाकुल है और नयी परिस्थितियों को समझने का प्रयास कर रही है,जिसमे आतंरिक मानसिक द्वन्द बहुत ज्यादा है..हो सकता है आगे वो कोई बड़ा फैसला ले !

“नताशा” – “रिपोर्टर नताशा”...”कमांडर नताशा”...”शाळा” और अब “ऑफिसर नताशा” ऑफ़ कमांडर फ़ोर्स(जो राजनगर में तब अपराध रोकने की कोशिश में लगी है जब ध्रुव के मरने/गायब होने की सुई उसके पिता रोबो की ओर घूमी हुई है!)
नताशा का रोल हर बार की तरह नए रहस्य से भरा लग रहा है..और अगर ध्रुव भी उससे नाराज़ है तो मामला गंभीर होने की पूरी गुंजाइश है..यह कितना घूमा हुआ एंगल है.यह भी आगे पता चलेगा!
मीशा...मास्टर M..."रोनिन" अन्य नए चेहरे हैं..और हाँ एक जल मानव भी..जिसका राज़ अगले भाग में खुलेगा!
नारका जेल पर हुए हमले पर कहानी अप्ल विराम लेती है...आगे की कहानी के लिए "ब्रेकआउट" का इंतज़ार शुरू !

आर्टवर्क –

पेंसिल- हेमंत कुमार जी के बनाये आर्टवर्क की अब आदत हो गयी है..बाकी सीरीज की तरह सुपर कमांडो ध्रुव को भी उन्होंने उम्दा ढंग से संभाला हुआ है... सुपर कमांडो ध्रुव एक नवयुवक का पूरा एहसास कराता है! “कोड नेम कॉमेट” में परिस्थितीवश ध्रुव में कहानी की मांग के हिसाब से काफी परिवर्तन हुए हैं..छोटे छोटे बाल...काम करने का अलग अंदाज़ होने की वज़ह से कॉमेट और सुपर कमांडो ध्रुव में अंतर रखने में हेमंत जी कामयाब रहे हैं! रिचा को बहुत खूबसूरत बनाया है उन्होंने...ब्लैक कैट के रूप में भी..प्लस पॉइंट

हाँ एक बात सच में बहुत गैर जरूरी सी लगती है..कि कॉमिक्स में श्वेता को बहुत Outdated बनाया हुआ है..अगर वो विदेश से पढ़कर आई है तब भी और अगर आज तक आई पुरानी कॉमिक्स में मुख्यतः उसको जैसी बनाया जाता रहा है तब भी कम से कम उसके तेल में डूबे हुए चिपके बाल...पूरी कॉमिक्स में सिर्फ एक पीले रंग की सलवार कमीज़ पहनाये रखने से बचा जा सकता था..दुखी दिखने के लिए देहातन बना देना बहुत पुराना आईडिया है ! हेमंत जी को अगली कॉमिक्स में श्वेता में परिवर्तन लाने चाहिए!
सुशांत जी के बनाये हुए 2 क्लासिक पेज बहुत अच्छे बने हैं !

इंकिंग –ईश्वर जी ने उम्मीद से कहीं बेहतर और “परफेक्ट से कम” काम इंकिंग में किया है! उनके अन्दर विनोद कुमार और जगदीश जी की तरह सफल इंकर आर्टिस्ट बनने की क्षमता है...कुल मिलाकर उनका काम अच्छा है..कुछ पेज में कई जगह पर बॉडी के मूवमेंट्स में गड़बड़ रही है..जैसे शरीर असली ना होकर कोई बेजान तस्वीर चिपकी हो..नए होने की वज़ह से उनमे बहुत Potential है...उन्हें और मौके दिए जाते रहने चाहिए जिससे वो और उम्दा निखार ला सकें !

रंग-संयोजन-शादाब सिद्दीकी जी का रंग है...और सबसे राहत की बात यह है कि कोड नेम कॉमेट में वापस "कलरिंग इफेक्ट्स" भी करे गए हैं..जिनकी वज़ह से कॉमिक्स का पूरा लुत्फ़ मिला है..इफेक्ट्स के बिना कॉमिक्स की कल्पना करना अब नामुमकिन बात है..कृपया पूरी कोड नेम कॉमेट सीरीज को इफेक्ट्स के साथ ही पूरी करें !
शब्दांकन भी लेखक मंदार गंगेले जी का है..इक्का-दुक्का जगह छोटी गलती रह गयीं..लेकिन पूरी कॉमिक्स में मेहनत से दिखाई देता है...खासकर बड़ी आवाजों में...जिसमे फ्रेम्स में सिवाय सीन्स के अलावा और कुछ नहीं होता !कैप्शन बॉक्सेस में हुए प्रयोग उम्दा रहे हैं!

अंत में यह बात जाहिर सी है..कि "कोड नेम कॉमेट" जो 4 भाग लम्बी कहानी का पहला अंश और शुरुआत भर ही है..बहुत से सवाल भी छोड़ती है..उनके जवाब आगे के भागों में मिलने की उम्मीद है...इसलिए तटस्थ रूप में यह पहला भाग पूरी कहानी को एक अच्छी शुरुआत दे चुका है...“कोड नेम कॉमेट” का लुत्फ़ उठाइये!